>दो लघुकथाएं: गाँधी और गाँधीवाद, निपूती भली थी -आचार्य संजीव ‘सलिल’ की

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आचार्य संजीव ‘सलिल’ की दो लघुकथाएं

१. गाँधी और गाँधीवाद
* बापू आम आदमी के प्रतिनिधि थे. जब तक हर भारतीय को कपड़ा न मिले, तब तक कपड़े न पहनने का संकल्प उनकी महानता का जीवत उदाहरण है. वे हमारे प्रेरणास्रोत हैं’ -नेताजी भाषण फटकारकर मंच से उतरकर अपनी मंहगी आयातित कार में बैठने लगे तो पत्रकारों ने उनसे कथनी-करनी में अन्तर का कारण पूछा.

नेताजी बोले– ‘बापू पराधीन भारत के नेता थे. उनका अधनंगापन पराये शासन में देश की दुर्दशा दर्शाता था, हम स्वतंत्र भारत के नेता हैं. अपने देश के जीवनस्तर की समृद्धि तथा सरकार की सफलता दिखाने के लिए हमें यह ऐश्वर्य भरा जीवन जीना होता है. हमारी कोशिश तो यह है की हर जनप्रतिनिधि को अधिक से अधिक सुविधाएं दी जायें.’

‘ चाहे जन प्रतिनिधियों की सुविधाएं जुटाने में देश के जनगण क दीवाला निकल जाए. अभावों की आग में देश का जन सामान्य जलाता रहे मगर नेता नीरो की तरह बांसुरी बजाते ही रहेंगे- वह भी गाँधी जैसे आदर्श नेता की आड़ में.’ – एक युवा पत्रकार बोल पड़ा.

अगले दिन से उसे सरकारी विज्ञापन मिलना बंद हो गया.

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२. निपूती भली थी 
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बापू के निर्वाण दिवस पर देश के नेताओं, चमचों एवं अधिकारियों ने उनके आदर्शों का अनुकरण करने की शपथ ली. अख़बारों और दूरदर्शनी चैनलों ने इसे प्रमुखता से प्रचारित किया.

अगले दिन एक तिहाई अर्थात नेताओं और चमचों ने अपनी आंखों पर हाथ रख कर कर्तव्य की इति श्री कर ली. उसके बाद दूसरे तिहाई अर्थात अधिकारियों ने कानों पर हाथ रख लिए, तीसरे दिन शेष तिहाई अर्थात पत्रकारों ने मुंह पर हाथ रखे तो भारत माता प्रसन्न हुई कि देर से ही सही इन्हे सदबुद्धि तो आयी.

उत्सुकतावश भारत माता ने नेताओं के नयनों पर से हाथ हटाया तो देखा वे आँखें मूंदे जनगण के दुःख-दर्दों से दूर सत्ता और सम्पत्ति जुटाने में लीन थे.

दुखी होकर भारत माता ने दूसरे बेटे अर्थात अधिकारियों के कानों पर रखे हाथों को हटाया तो देखा वे आम आदमी की पीड़ाओं की अनसुनी कर पद के मद में मनमानी कर रहे थे. नाराज भारत माता ने तीसरे पुत्र अर्थात पत्रकारों के मुंह पर रखे हाथ हटाये तो देखा नेताओं और अधिकारियों से मिले विज्ञापनों से उसका मुंह बंद था और वह दोनों की मिथ्या महिमा गा कर ख़ुद को धन्य मान रहा था.

अपनी सामान्य संतानों के प्रति तीनों की लापरवाही से क्षुब्ध भारत माता के मुँह से निकला- ‘ऐसे पूतों से तो मैं निपूती ही भली थी.

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दो मजेदार कहानियाँ

(१) मजाक
एक मैनेजर साहब अपने मातहतों के साथ अक्सर मजाक किया करते थे और मजाक करते वक्त वे इस बात का ध्यान नहीं रखते थे कि उनके मजाक से किसी को बुरा लग सकता है । इसके कारण कर्मचारी उस मैनेजर से परेशान रहते थे । एक बार क्रिसमस की पार्टी में लोगों ने उन्हे सबक सिखाने का तय किया । जब पार्टी शबाब पर थी मैनेजर साहब दो मिनट के लिये टॉयलेट गये तो एक व्यक्ति ने उनके कोट की जेब से पर्स निकाला और देखा कि उसमें क्या-क्या सामान है, उसके हाथ उसी रात घोषित होने वाली लॉटरी का टिकट लगा, उन्होंने उसका नम्बर नोट करके उसे वापस उनके कोट की जेब में रख दिया । अब वे लोग मजाक के लिये तैयार थे । फ़िर उन्होंने होटल के बैरे को एक कोने में ले जाकर कुछ गुफ़्तगू की । मैनेजर साहब टॉयलेट से वापस आकर पार्टी का आनन्द उठाने लगे ।
अचानक थोडी देर बाद एक वेटर ने हॉल में आकर घोषणा की कि आज रात को जो महालॉटरी खुलने वाली थी उसकी घोषणा हो गई है, और उसने एक नम्बर बताया और कहा कि इस नम्बर के मालिक को दस करोड़ रुपये मिलने वाले हैं । मैनेजर साहब ने चुपचाप पर्स निकालकर नम्बरों का मिलान किया और मन-ही-मन बहुत खुश हुआ, लेकिन जैसी कि उसकी आदत थी, उसने यह किसी पर जाहिर नहीं किया, हालांकि मजाक करने वाले कर्मचारी सब कुछ जानते थे । सभी ने देखा कि मैनेजर साहब बहुत मस्त हो गये हैं और बहुत पीने लगे हैं । कुछ देर बाद मैनेजर साहब उठे और जोर-जोर से उन्होंने घोषणा की – इस कम्पनी का मालिक बेहद खूसट है और उसका लडका जो कि मेरा बॉस भी है बेहद निकम्मा और नालायक है । इस कम्पनी के सभी कर्मचारी कामचोर और चमचागिरी में माहिर हैं । मेरी सेक्रेटरी को मैं बहुत चाहता हूँ और उससे शादी करने वाला हूँ, इसलिये मेरी पत्नी सहित तुम सभी भाड़ में जाओ, मैं इस घटिया कम्पनी को लात मारता हूँ…
अगली सुबह न नौकरी थी, न बीवी, न सेक्रेटरी और जाहिर है कि न ही लॉटरी का पैसा भी ।
सबक : या तो किसी के साथ बुरा मजाक मत करो या फ़िर अपने साथ भी वैसा ही होने के लिये तैयार रहो ।

(२) गरीब पर एक शॉर्ट नोट
हाल ही में जारी आँकडों के मुताबिक भारत में अमीरों और करोडपतियों की संख्या तेजी से बढ रही है, कुछ कम्पनियों में कुछ लोगों के वेतन एक करोड रुपये से भी ऊपर निकल गये हैं… दस-पन्द्रह वर्षों में तो कई नौनिहाल पैदा होते ही करोडपति और युवा होते-होते अरबपति हो जायेंगे । गरीबी या अभाव क्या होता है वे कभी भी नहीं जान पायेंगे । ऐसे माहौल (?) सन २०४० में कक्षा पाँचवीं के एक बालक से “एक गरीब परिवार” पर “शॉर्ट नोट” लिखने को कहा गया, उसने लिखा – …”एक बार एक बहुत ही गरीब फ़ैमिली थी, पति और पत्नी दोनों बहुत गरीब थे, दो बच्चे थे वे भी बहुत गरीब थे । उनके घर के सारे नौकर भी गरीब थे, माली, ड्रायवर और गार्ड भी बहुत गरीब थे । तीन मर्सिडीज में से दो की सर्विसिंग छः महीने से नहीं हुई थी और एक गाडी का एसी काम नहीं कर रहा था । पाँच कलर टीवी में से दो खराब पडे थे । उस गरीब फ़ैमिली ने दो साल से घर में फ़र्नीचर और “रेनोवेशन” नहीं करवाया था । यहाँ तक कि छुट्टियाँ बिताने सिंगापुर और मलेशिया तक गये एक साल से ऊपर हो गया था । दोनों बच्चे जो कि मेरी उम्र के हैं उनके पास क्रेडिट कार्ड तक नहीं है, उनके कुत्तों को चार दिन से चिकन खाने को नहीं मिला था । मतलब यह कि “ऑल-इन-ऑल” वह एक बहुत ही गरीब परिवार है ।…

>दो मजेदार कहानियाँ

>(१) मजाक
एक मैनेजर साहब अपने मातहतों के साथ अक्सर मजाक किया करते थे और मजाक करते वक्त वे इस बात का ध्यान नहीं रखते थे कि उनके मजाक से किसी को बुरा लग सकता है । इसके कारण कर्मचारी उस मैनेजर से परेशान रहते थे । एक बार क्रिसमस की पार्टी में लोगों ने उन्हे सबक सिखाने का तय किया । जब पार्टी शबाब पर थी मैनेजर साहब दो मिनट के लिये टॉयलेट गये तो एक व्यक्ति ने उनके कोट की जेब से पर्स निकाला और देखा कि उसमें क्या-क्या सामान है, उसके हाथ उसी रात घोषित होने वाली लॉटरी का टिकट लगा, उन्होंने उसका नम्बर नोट करके उसे वापस उनके कोट की जेब में रख दिया । अब वे लोग मजाक के लिये तैयार थे । फ़िर उन्होंने होटल के बैरे को एक कोने में ले जाकर कुछ गुफ़्तगू की । मैनेजर साहब टॉयलेट से वापस आकर पार्टी का आनन्द उठाने लगे ।
अचानक थोडी देर बाद एक वेटर ने हॉल में आकर घोषणा की कि आज रात को जो महालॉटरी खुलने वाली थी उसकी घोषणा हो गई है, और उसने एक नम्बर बताया और कहा कि इस नम्बर के मालिक को दस करोड़ रुपये मिलने वाले हैं । मैनेजर साहब ने चुपचाप पर्स निकालकर नम्बरों का मिलान किया और मन-ही-मन बहुत खुश हुआ, लेकिन जैसी कि उसकी आदत थी, उसने यह किसी पर जाहिर नहीं किया, हालांकि मजाक करने वाले कर्मचारी सब कुछ जानते थे । सभी ने देखा कि मैनेजर साहब बहुत मस्त हो गये हैं और बहुत पीने लगे हैं । कुछ देर बाद मैनेजर साहब उठे और जोर-जोर से उन्होंने घोषणा की – इस कम्पनी का मालिक बेहद खूसट है और उसका लडका जो कि मेरा बॉस भी है बेहद निकम्मा और नालायक है । इस कम्पनी के सभी कर्मचारी कामचोर और चमचागिरी में माहिर हैं । मेरी सेक्रेटरी को मैं बहुत चाहता हूँ और उससे शादी करने वाला हूँ, इसलिये मेरी पत्नी सहित तुम सभी भाड़ में जाओ, मैं इस घटिया कम्पनी को लात मारता हूँ…
अगली सुबह न नौकरी थी, न बीवी, न सेक्रेटरी और जाहिर है कि न ही लॉटरी का पैसा भी ।
सबक : या तो किसी के साथ बुरा मजाक मत करो या फ़िर अपने साथ भी वैसा ही होने के लिये तैयार रहो ।

(२) गरीब पर एक शॉर्ट नोट
हाल ही में जारी आँकडों के मुताबिक भारत में अमीरों और करोडपतियों की संख्या तेजी से बढ रही है, कुछ कम्पनियों में कुछ लोगों के वेतन एक करोड रुपये से भी ऊपर निकल गये हैं… दस-पन्द्रह वर्षों में तो कई नौनिहाल पैदा होते ही करोडपति और युवा होते-होते अरबपति हो जायेंगे । गरीबी या अभाव क्या होता है वे कभी भी नहीं जान पायेंगे । ऐसे माहौल (?) सन २०४० में कक्षा पाँचवीं के एक बालक से “एक गरीब परिवार” पर “शॉर्ट नोट” लिखने को कहा गया, उसने लिखा – …”एक बार एक बहुत ही गरीब फ़ैमिली थी, पति और पत्नी दोनों बहुत गरीब थे, दो बच्चे थे वे भी बहुत गरीब थे । उनके घर के सारे नौकर भी गरीब थे, माली, ड्रायवर और गार्ड भी बहुत गरीब थे । तीन मर्सिडीज में से दो की सर्विसिंग छः महीने से नहीं हुई थी और एक गाडी का एसी काम नहीं कर रहा था । पाँच कलर टीवी में से दो खराब पडे थे । उस गरीब फ़ैमिली ने दो साल से घर में फ़र्नीचर और “रेनोवेशन” नहीं करवाया था । यहाँ तक कि छुट्टियाँ बिताने सिंगापुर और मलेशिया तक गये एक साल से ऊपर हो गया था । दोनों बच्चे जो कि मेरी उम्र के हैं उनके पास क्रेडिट कार्ड तक नहीं है, उनके कुत्तों को चार दिन से चिकन खाने को नहीं मिला था । मतलब यह कि “ऑल-इन-ऑल” वह एक बहुत ही गरीब परिवार है ।…