>गीतिका: बिना नाव पतवार हुए हैं. – आचार्य संजीव ‘सलिल’

>बिना नाव पतवार हुए हैं.
क्यों गुलाब के खार हुए हैं.

दर्शन बिन बेज़ार बहुत थे.
कर दर्शन बेज़ार हुए हैं.

तेवर बिन लिख रहे तेवरी.
जल बिन भाटा-ज्वार हुए हैं.

माली लूट रहे बगिया को-
जनप्रतिनिधि बटमार हुए हैं.

कल तक थे मनुहार मृदुल जो,
बिना बात तकरार हुए हैं.

सहकर चोट, मौन मुस्काते,
हम सितार के तार हुए हैं.

महानगर की हवा विषैली.
विघटित घर-परिवार हुए हैं.

सुधर न पाई है पगडण्डी,
अनगिन मगर सुधार हुए हैं.

समय-शिला पर कोशिश बादल,
‘सलिल’ अमिय की धार हुए हैं.

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>तेवरी: मार हथौडा, तोड़ो मूरत. संजीव ‘सलिल’

>तेवरी

संजीव ‘सलिल’

मार हथौडा, तोड़ो मूरत.
बदलेगी तब ही यह सूरत..

जिसे रहनुमा माना हमने
करी देश की उसने दुर्गत..

आरक्षित हैं कौए-बगुले
कोयल-राजहंस हैं रुखसत..

तिया सती पर हम रसिया हों.
मन पाले क्यों कुत्सित चाहत?.

खो शहरों की चकाचौंध में
किया गाँव का बेड़ा गारत..

क्षणजीवी सुख मोह रहा है.
रुचे न शाश्वत-दिव्य विरासत..

चलभाषों की चलाचली है.
‘सलिल’ न कासिद और नहीं ख़त..

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>गीतिका: तितलियाँ –संजीव ‘सलिल’

>गीतिका

तितलियाँ

संजीव ‘सलिल’

यादों की बारात तितलियाँ.

कुदरत की सौगात तितलियाँ..

बिरले जिनके कद्रदान हैं.

दर्द भरे नग्मात तितलियाँ..

नाच रहीं हैं ये बिटियों सी

शोख-जवां ज़ज्बात तितलियाँ..

बद से बदतर होते जाते.

जो, हैं वे हालात तितलियाँ..

कली-कली का रस लेती पर

करें न धोखा-घात तितलियाँ..

हिल-मिल रहतीं नहीं जानतीं

क्या हैं शाह औ’ मात तितलियाँ..

‘सलिल’ भरोसा कर ले इन पर

हुईं न आदम-जात तितलियाँ..

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