>एक राह भली

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आँख खुली 
अँधेरा छा गया
राह मिली
मन घबरा गया
सतपथ  पर चला
कांटा पैरो में लगा
अच्छाई के लिए बढ़ा
सुना बहुत बुरा – भला
सोचा क्यूँ नींद खुली ?
वो अनजानी राह थी भली
ठंडी सी हवा चली
गगन में चमकी बिजली
धरा बरसने लगी
लों ज्वाला बनने लगी
ऐसा लगा जैसे
कोई कह रहा हो
यही राह सही
इंसान तोह कोई नहीं
पर आवाज़ आई एक नयी
फूल खिलने लगे
कांटे हटने लगे
मुस्कुराहते मिली
वाह! कैसी राह हें ये भली
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>गुटबाजी क्यों नहीं है ? क्या एक ,एक गुट का नाम गिनाया जाए……..–जनोक्ति

>ब्लॉग्गिंग  में गुटबंदी और विचारधारा के मतभेदों को लेकर संवाद अभी जारी है.  इस पर अभी मुझे कुछ कहना है लेकिन मैं अपनी बात करूँगा बाद में. पहले बात एक टिप्पणी की जो किसी वजह से वहां नजर नहीं आ सकी. मुझे इसका कारण तकनीकी गडबडी बताया गया है. जनोक्ति की तरफ से प्राप्त हुयी इस टिप्पणी को उसी  रूप में यहाँ पोस्ट किया जा रहा है तां की संवाद और आगे बढ़ सके. तकनीकी गडबडी की वजह से ही यह टिप्पणी मुझे मेल से भेजी गयी है. वास्तव में  इस संवाद की शुरुआत ही इस लिए की गयी है कि कोई भी कलमकार मन की बात खुल कर कह सके.  तो लीजिये अब आप पढ़िये टिप्पणी ज्यूँ कि त्यूं केवल कुछ नाम काट दिए गए हैं ; मेरी बात होगी बाद में अगली पोस्ट में :                                                                                                                     –रैक्टर कथूरिया

दरअसल, कमिओं को ढंकें नहीं उसे स्वीकार करें .. गुटबाजी क्यों नहीं है ? क्या एक ,एक गुट का नाम गिनाया जाए आप लोगों को ?
वामपंथियों , दक्षिणपंथियों , कांग्रेस्सियों , हिंदुवादियों , इसलामिक कट्टरपंथियों आदि ;;;;; सभी के गुट बटे हुए है .…अनेक मंच हैं जहाँ गुटबाजी होती है और अपने विपरीत बात करने वालों से दूरी बनाये रखा जाता है ………
कुछ दिनों पहले तक एक तथाकथित कबाड़ी भाई जो उदय प्रकाश मामले में चर्चित रहे , यहाँ आया करते थे और वैचारिक असहमति के बावजूद अपनी प्रतिक्रियाओं में तार्किक ढंग से अपनी बात रखते थे ….. आज कल उनके साथियों ने उनको भी लताड़ा है शायद ! श्रीमान गायब है …… क्या वैचारिक मतभेद को मनभेद बनाकर चलना चाहिए ?
नेताओं की भांति बुद्धिजीवी कहलाने वाले लेखन कर्म से जुड़े लोगों की तो कोई मजबूरी नहीं होनी चाहिए की हम एक मंच पर संवाद करते न दिखें .. विचारधारा को भी धर्म की तरह नितांत निजी समझा जाये तभी कल्याण है ……..
मैं किसी भी विचारधारा का हूँ इससे क्या फर्क पड़ता है देश और समाज के भले में जो सच है उसे जरुर कहना चाहिए ……………
                   आज हिंदी चिट्ठाकारी कच्चे बांस की तरह है जिसे झुका कर जो चाहे बनाया जा सकता है … तो यही मौका है जब मुख्यधारा की मीडिया के वर्तमान चरित्र से इसे बचाकर एक नए आयाम को जन्म दिया जाए …… हिंदी ब्लॉग जगत को ऐसा उदाहरण बना कर पेश किया जाए जहाँ विभिन वादों /विचारों /मानसिकताओं के लोग एक साथ एक -दुसरे को पढ़ते ,समझते ,बहस करते ,और एक -दुसरे से अच्छाई की सिख लेते हैं ….. इस मंच को सामुदायिक बनाने के पीछे हमारा यही उद्देश्य रहा है ……. हालाँकि कुछ डरपोक लोग जो आलोचना बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं वो यहाँ आये और फिर चले गये .…. मंच को साम्प्रदायिक बता कर खूब गालियाँ भी लिखी अपने ब्लॉग पर ! खैर , अब ऐसों को कौन समझाए कि सामुदायिक ब्लॉग की किसी एक पोस्ट पढ़कर उस ब्लॉग की विचारधारा का फैसला करना मुर्खता है !

संगीता जी ,थोडा असहमत विवाद को संवाद कहें तो ज्यादा सकारात्मक होगा .

परहेज तो नहीं हो इसलिए तो हमने यहाँ घोषणा कर रखी है विचारधारा की बाध्यता के बगैर सभी लोग जनोक्ति :संवाद का मंच की सदस्यता ले सकते हैं.                                          –-जनोक्ति

>सही कौन

>देश में महिलाओ के साथ भेदभाव होता रहा है ऐसा आरोप कई बार लग चुका है ,बुद्धिजीवियों ,सहायता समूहों ,और कई और भी समूहों के द्वारा बार बार मांग उठती रही है की महिलाओ को भी पुरुषोके बराबर अधिकार दो लेकिन होता हर बार एक ही चीज़ है वो ये की जब तक प्रदर्शन होता है मामला गर्म रहता है और थोड़े दिनों के बाद ठंडे बसते में दाल दिया जाता है कुछ बातें सही भी होती है लेकिन इनको लगता है की भेदभाव ही हो रहा है इसका ताज़ा उद्धरण है ,अगर इस मुद्दे को लेकर हाल की बात करे तो एयर फोर्सके आधिकारी पी .सी .बारबोरा द्वारा महिलाओ को एयरफोर्स और सेना लड़ाकू विमान उड़ाने नहीं देने सम्बन्धी बात को लेकर है ,बारबोरा का कहना है की एक लड़ाकू वायुयान चालक को तैयार करने में सेना को तक़रीबन १२ करोड़ रूपये का खर्च सेना और भारत सरकार पर आता है और ये कुछ दिनों बाद यानि शादी के बाद जॉब छोड़ देती है येः अगर सही तरीके से देखे तो सही भी है ,लेकिन महीला आन्दोलन कारियोंको येः बात भी सही नहीं लगी .एक बात तो जो साफ़ है वो येः क्या की सही में सरकार के पैसे को सही चीज़ में खर्च करना चाहए ये आम लोगो का ही तो पैसा है अगर इन चालको को नौकरी छोडनी है तो कम से कम इस बात को पहले ही स्वीकार कर ले ताकि देश का पैसा बेकार न चले जाए .मैं अगर कहूँ इन मुद्दे को अगर ठंडे बसते में डाला भी जाए तो ठीक ही है ये तो देश के पैसे का सवाल है .इतनी जनता भूख से बेहाल है और वहां क्या हो रहा है ?आप भी इस पर जरूर कुछ कहे क्या वो आन्दोलनकारी सही है ,महिलाओ के आभिकारो को लेकर लड़ने वाले सही है या फिर एयरफोर्स के अधिकारी बारबोरा ?

साइट पर विज्ञापन/खबरें देखिये, पैसा कमाईये…

जैसा कि सभी जानते हैं हम सभी टीवी पर आने वाले विज्ञापन चाहे फ़िल्मों में हों या न्यूज़ में सभी जगह परेशान रहते हैं, जैसे ही विज्ञापन आता है, हम तत्काल चैनल बदल लेते हैं… अखबार में आये हुए पेम्फ़लेट को एक नज़र देखते भी नहीं, होर्डिंग पर भी उड़ती सी नज़र तभी पड़ती है जब ट्रेफ़िक जाम में फ़ँसे हों या कोई खूबसूरत मॉडल दिखाई दे। यह बात अब विज्ञापन कम्पनियाँ भी जान गई हैं कि लोग विज्ञापनों से उकताने लगे हैं, परेशान होने लगे हैं। जैसे-जैसे इंटरनेट का प्रसार बढ़ रहा है, अब कम्पनियाँ अपना फ़ोकस इधर शिफ़्ट कर रही हैं। नेट पर विज्ञापन दिखाना तो और भी मुश्किल है, क्योंकि कम्प्यूटर/लेपटॉप पर काम करने वाले की निगाहों का फ़ोकस अमूमन अपने काम पर ही होता है, ज्यादातर लोगों ने “पॉप-अप ब्लॉकर” चालू किये होते हैं। तब सवाल उठता है कि उपभोक्ता को विज्ञापन कैसे दिखाये जायें, जवाब मिला कि उसे विज्ञापन देखने का भी पैसा दिया जाये, तब कम से कम कुछ प्रतिशत लोग नेट पर इसी बहाने विज्ञापन देखेंगे। इसलिये आजकल “पेड-विज्ञापन” देखो वाली साईटें आ रही हैं।

कुछ दिनों पूर्व जब मैंने “ओबामा तेल” वाली पोस्ट लिखी थी, उस समय कुछ पाठकों ने मुझसे मजाक में पूछा था कि क्या यह विज्ञापन के तौर पर लिखी गई “प्रमोशनल” पोस्ट है? ज़ाहिर है कि ऐसा नहीं था, लेकिन मेरी आज की यह पोस्ट विशुद्ध रूप से एक प्रमोशनल पोस्ट है। हालांकि इस प्रकार के “आईडियाज़” देने में अवधिया जी, पाबला जी जैसे ब्लॉगर सिद्धहस्त हैं और नेट से कमाई करने में शायद अव्वल भी। मैंने कभी-कभी विज्ञापन, एडसेंस आदि से कमाई करने के बारे में विचार किया, प्रयास भी किया लेकिन आज तक सफ़लता नहीं मिली है।

हाल ही में मेरे एक मित्र ने मुझे एक वेबसाईट के बारे में बताया जिसके द्वारा उसे सिर्फ़ विज्ञापन देखने की वजह से आय हुई। ऐसी बातों पर मुझे जल्दी विश्वास नहीं होता, इसलिये मैंने उसे सबूत देने को कहा और उसने खुद सहित तीन अन्य मित्रों को कम्पनी से आया हुआ 1200/- रुपये का चेक दिखा दिया, तो ब्लॉगर मित्रों और प्रिय पाठकों, वही वेबसाईट अर्थात http://viewbestads.com/ref/MTU2ODc=aXY= और उसकी तमाम जानकारी मैं आपके लिये यहाँ पेश कर रहा हूं।

फ़ण्डा सीधा-सादा है, कि आपको इस वेबसाईट का सदस्य रजिस्टर होना है (कोई शुल्क नहीं), आपको एक कन्फ़र्मेशन मेल भेजा जायेगा तथा आपका खाता खुल जायेगा (बिलकुल मुफ़्त)। फ़िर आपको प्रतिदिन सिर्फ़ 5-6 विज्ञापन तथा 2-3 समाचार देखना है (जो कि कुल जमा 5-8 मिनट का काम है), जिसके बाद आपके खाते में कुछ अंक जमा कर दिये जायेंगे, कुछ निश्चित अंकों के होने पर एक निश्चित रकम बढ़ती जायेगी, और जैसे ही आपके खाते में 1200/- रुपये की रकम एकत्रित हो जायेगी, आपसे बैंक अकाउंट नम्बर तथा पहचान पत्र (ड्रायविंग लायसेंस, पेन कार्ड आदि) लेकर “आपके नाम से” चेक बनाया जायेगा।

हम भारत के लोग हमेशा, फ़र्जीवाड़ा कैसे किया जाये, तथा मुफ़्त में मिलने वाली चीज़ का भी अधिकाधिक फ़ायदा कैसे लिया जाये इस जुगाड़ में लगे रहते हैं। इस वेबसाइट के “विज्ञापन देखो” वाली नीति में कोई MLM वाली पद्धति नहीं है, ऐसा कोई बन्धन नहीं है कि आपको अपने नीचे डाउनलाइन में कोई सदस्य बनाना हो। इस वेबसाईट द्वारा एक व्यक्ति का (घर के पते और मेल आईडी अनुसार) एक ही रजिस्ट्रेशन किया जायेगा। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति दो-चार फ़र्जी नामों से ईमेल आईडी देकर विज्ञापन देखता भी है तो जब पैसा लेने की बारी आयेगी तब बैंक अकाउंट क्रमांक से वह पकड़ में आ जायेगा (इसमें लोचा यह है कि यदि आपके अलग-अलग नामों से 2-3 बैंकों में खाते हों तब यह फ़र्जीवाड़ा किया जा सकता है)। इसी प्रकार एक दिन में एक आईडी से सिर्फ़ एक बार ही विज्ञापन देखे जा सकते हैं, एक बार विज्ञापन और न्यूज़ देख लेने के बाद उस पर एक टिक का निशान बन जाता है, और फ़िर आप उस मेल आईडी से अगले दिन ही विज्ञापन देख सकते हैं।

बहरहाल, आते हैं मुख्य बात पर… जब रजिस्ट्रेशन हो जायेगा और आपका प्रोफ़ाइल पूरा अपडेट हो जायेगा तब View Ads पर क्लिक करके आपको एक-एक विज्ञापन देखना है, क्लिक करने पर एक नई विण्डो खुलेगी, जिसमें कुछ सेकण्डों का समय चलता हुआ दिखेगा, उतने सेकण्ड पश्चात जब आपके खाते में अंकों के जमा होने की सूचना झलकेगी तब वह विण्डो बन्द करके नया विज्ञापन खोल लें। ऐसा दिन में एक खाते से एक बार ही किया जा सकेगा, तथा यह कुल मिलाकर सिर्फ़ 5-7 मिनट का काम है। जब आप सारे विज्ञापन और समाचार देख लें तब फ़िर अगले दिन ही आप लॉग-इन करें। सावधानी यह रखनी है कि जब तक वह विज्ञापन पूरा खत्म न हो जाये और अंक जमा होने की सूचना न आ जाये, तब तक विज्ञापन वाली विण्डो बन्द नहीं करना है, तथा एक बार में एक ही विज्ञापन की विण्डो खोलना है, एक साथ सारे विज्ञापनों की विण्डो खोलने पर आपका अकाउंट फ़्रीज़ होने की सम्भावना है। मेरे खयाल में हम लोग नेट पर जितना समय बिताते हैं उसमें से 5-7 मिनट तो आसानी से इस काम के लिये निकाले जा सकते हैं, और जब कोई शुल्क नहीं लग रहा है तब इस पर रजिस्ट्रेशन करने में क्या बुराई है। अर्थात नुकसान तो कुछ है नहीं, “यदि” हुआ तो फ़ायदा अवश्य हो सकता है।

अब आप कहेंगे कि आप ये सब क्यों लिख रहे हैं? इससे आपको क्या फ़ायदा है…बताता हूं, फ़ायदा सिर्फ़ इतना है कि जो लिंक मैं आपको दे रहा हूं, आप उस लिंक पर क्लिक करके मेरे डाउनलाइन (Referred by ID) में सदस्य बनेंगे तो कुछ अंक मेरे खाते में जुड़ जायेंगे। यदि आप चाहें तो सीधे वेबसाइट के पते पर क्लिक करके भी सदस्यता ले सकते हैं, लेकिन इससे किसी का फ़ायदा नहीं होगा, जबकि मेरे ID क्रमांक से सदस्यता लेने पर मुझे कुछ फ़ायदा हो सकता है (यह सेल्समैन टाइप की बेशर्मी भरा वक्तव्य है)। हालांकि इस स्कीम में कमाई की गति धीमी है (मैंने इस वेबसाइट पर 16 नवम्बर को रजिस्ट्रेशन करवाया है, ईमानदारी से सिर्फ़ एक आईडी से इन 15 दिनों में मेरे खाते में अभी 300 रुपये जमा हुए हैं), लेकिन मुफ़्त में मिलने वाले और रोज़ाना सिर्फ़ 5-7 मिनट का समय देने पर आपको इससे अधिक की उम्मीद भी नहीं करनी चाहिये। इसलिये विज्ञापन देखें और रोज अपने खाते में कुछ रुपये जमा करें… मुझे धन्यवाद दें और मेरे डाउनलाइन में जुड़ जायें… जब भी नेट पर बैठें, दिन में एक बार विज्ञापन देखें, खबरें पढ़ें और पैसा कमायें। एक बार भरोसा करके देखने में क्या हर्ज है, जबकि जेब से कुछ भी अतिरिक्त नहीं लग रहा।

पूरी विधि एक बार फ़िर से –

1) http://viewbestads.com/ref/MTU2ODc=aXY= इस लिंक पर क्लिक करके साइट पर पहुँचें

2) ई-मेल आईडी भरकर रजिस्टर करवायें (रजिस्टर करते समय ध्यान रखें कि Referred ID में 15687 पर टिक करें)

3) आपके मेल बाक्स में एक मेल आयेगी, उस लिंक पर क्लिक करके कन्फ़रमेशन करें।

4) अपना सही-सही प्रोफ़ाइल पूरा भरें, ताकि यदि पैसा (चेक) मिले तो आप तक ठीक पहुँचे।

5) बस, विज्ञापन देखिये और खाते में अंक और पैसा जुड़ते देखिये (दिन में एक बार)

6) अपने मित्रों को अपनी लिंक फ़ारवर्ड करें और उन्हें अपनी डाउनलिंक में सदस्य बनने के लिये प्रोत्साहित करें ताकि कुछ अंक आपके खाते में भी जुड़ें (हालांकि ऐसा कोई बन्धन नहीं है)…

मुझे लगता है, ब्लॉग से तो कुछ कमाई हो नहीं रही, अतः ऐसे तरीके आजमाने में कोई बुराई नहीं है। यदि फ़ायदा नहीं भी हुआ, तो नुकसान यकीनन नहीं होगा… रोज़ाना नेट पर काम करते-करते 5-10 मिनट अतिरिक्त निकाले जा सकते हैं।

>इनके हाथों में ये तलवार, ये भाले क्यूं हैं !

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आज सुबह मेल देखने बैठा तो एक शुभचिंतक  का पत्र  था…उनकी पीड़ा और चिंता बहुत ही जायज़ लगी….बात ब्लॉग्गिंग में बढ़ रही गुटबंदी की थी….हालांकि यह कोई नयी बात नहीं है..जब ब्लॉग नहीं थे उस समय भी यह गुट मौजूद थे…मैंने देखा बहुत से अच्छे लोगों की ऊर्जा इस गुटबंदी ने बर्बाद कर दी..बहुत से अच्छे   अच्छे  प्रोजेक्ट इसकी भेंट चढ़  गए….पर यह विकृति कभी भी पूरी तरह से खत्म नहीं हुयी…जिन कलमकारों ने समाज के बटवारे को रोकना था,   फूट को समाप्त करना था…गुटबंदिओं  को उखाड़ फेंकना  था…वही आपस में बंट  गए..उनके ही अलग अलग गुट बन गए…अपनी अपनी पत्रिकाएँ  और अपने अपने अखबार बन गए…लेखकों  का संगठन बना तो उसके भी गुट बन गए…सरकार और समाज के साथ टक्कर लेने वाले लोग एक दुसरे के सामने खड़े होकर लगे एक दुसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने…इस हालत ने बहुत सी और बुरायीओं  को भी जन्म दिया… फिलहाल मुझे याद आ रही है विनय दुब्बे की एक नज़म…जिसे मैंने एक पंजाबी पत्रिका में पढ़ा था…प्रस्तुत है उस नज़म का एक  अंश…..
मैं जब भी कविता लिखता हूँ
तो भूख को भूख लिखता हूँ,
विचार या विचारधारा नहीं लिखता……
……..
विचार या विचारधारा के सम्बन्ध में 
मुख्य सचिव प्रगतिशील  लेखक  संघ,
मुख्य सचिव जनवादी लेखक  संघ से बात करो…
मैं तो कविता लिखता हूँ….  
मैंने उस समय भी यही कहा था कि विचारों से स्वतंत्र रहने का विचार भी अपने आप में बुरा नहीं….पर उलझन और दुविधा के समय विचारधारा ही काम देती है…दरअसल फूट डालो और राज करो की नीति अब बहुत पुरानी हो चुकी है….इस नीति को सभी  नहीं तो बहुत से लोग पहचान  भी गए  हैं…अब आ चुकी है….कन्फ़ूज़ एंड रूल की नयी नीति……उल्झायो  और राज करो…..दुःख की बात है कि बहुत से कलमकार भी इस का शिकार ही चुके हैं..और उलझते जा रहे हैं…उन्हें सब कुछ ठीक या सब कुछ गलत लगता है…..जबकि ऐसा होता नहीं पर फिर भीर  दुविधा और उलझन बढ़  गयी है. ऐसी हालत में विचार या विचारधारा ही मार्गदर्शन  करती है.  पर
देखना यह होगा कि वे लोग खुद सीधे-सीधे किसी विचार या विचारधारा से प्रभावित हो रहे हैं या फिर नारेबाजी करने वाले किसी दल या गुट के  प्रभाव  में आ रहे  हैं….अगर किसी दल का प्रभाव है तो कम से कम यह ज़रूर देख लें कि उस दल के नेताओं की  अपनी निजी जिंदगी भी उस विचारधारा के अनुरूप ही है या फिर  वे कहते कुछ और है करते  कुछ और…
साहित्य  में बंगाल का अपना  अलग ही स्थान रहा है.  उस भूमि पर विचारों की कमी तो कभी भी नहीं रही…न ही जोश, मेहनत, लगन और इमानदारी की पर कहानी बहुत दुखद है इस बंगाल की..आनदमार्ग  के संस्थापक श्री श्री आनंद मूर्ती उर्फ़ पी आर सरकार के मुताबक एक दिन जो बंगाली दो बंगालों को  एक करने के लिए सारी शक्ति जुटाकर लडाई में कूद पढ़े थे  उसी बंगाली ने बंगाल को फिर से दो टुकड़े करने के लिए १९४७ के साल में अंग्रेजों के यहाँ दरबार किया था.  साल 1912  में जब दोनों बंगाल एक हो गए तब भी बंगालिओं ने सोचा वह लडाई में जयी हुए और और जब 1947  में बंगाल फिर से दो टुकड़े हुआ तब भी बंगालिओं ने सोचा वह जयी हुआ. इतिहास का यह कैसा वियोगान्त  नाटक (ट्रेजेडी) है…गौरतलब है कि वर्ष 1912 में दोनों बंगाल जब एक हुए तब बंगालिस्तान के अनेक अंश बंगाल से बाहर रख लिए गए थे..क्यों..? …..यह इतिहास ही बोल सकेगा…..यह कहानी काफी लम्बी है…..हम बात कर रहे ब्लॉग्गिंग में भी दाखिल हो चुकी गुटबंदी इतियाद की…
……आखिर में मुझे याद आ रहे हैं जनाब जावेद अख्तर  और उनकी एक नज़म :
लोग इन मुर्दा खुदाओं को सम्भाले क्यूं हैं !
फ़िक्र पे जंग है क्यूं,  ज़हन पे ताले क्यूं हैं !
धर्म तो आया था दुनिया में मोहब्बत के लिए..!
इनके हाथों में ये तलवार, ये भाले क्यूं हैं !               
बांटते फिरते हैं नफ़रत जो ज़माने भर में,
ऐसे इंसान तेरे चाहने वाले क्यूं हैं !
आँख रोशन हुयी सूरज की किरण से लेकिन,
ज़हन में अब भी अँधेरे के ये जले क्यूं है !
    कुल मिलकर अब यह आशा की जानी चाहिए कि हालत में सुधार होगा…नहीं तो इसका फायदा कोई तीसरा ही उठाएगा……..                                                          –रैक्टर कथूरिया

>ग़ज़ल

>उल्फत की तमन्ना का शायद यह सिला है,
हर शख्स ही दुनिया का अब हमसे खफा है.

गम और उदासी  का कुछ हॉल ही न पूछो,
हम कह न सकेंगे कि सब उनका दिया है.

अब छोड़ गए हो तो, मुड़ मुड के यूं न देखो;
इस ज़ख़्म पे खंजर तो पहले ही चला है.

क्या उनको बतायेंगे, क्या उनसे छुपायेंगे;
अब दिल का यह आलम तो बस में न रहा है.

कोई लम्हा भी न गुज़रा, जब याद न आये तुम;
हर वक्त ही इस दिल को, यादों ने डसा  है.

जिस पे भी भरोसा था कि साथ निभाएगा;
उसने ही साथ छोड़ा, बेगाना हुआ है.

क्या मैंने गंवाया है, क्या इश्क में पाया है?
पूछो न कि उल्फत में मैंने क्या लिया है ?
                              –रेक्टर कथूरिया
(आकाशवाणी जालंधर से १६ मार्च १९८५ को
प्रसारित कविता पाठ में से )

>२६/११ की गौरवपूर्ण घटना और चूतिया नंद की कथा

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कल २६/११ की बरसी को भारतवर्ष के चुनिन्दा शहरों में चुनिन्दा टीवी चैनलों और टेलीकोम कंपनियों के माध्यम से सवेदनशील जुझारू देशभक्तों ने , जो राष्ट्र की रक्षा के लिए कर्मठता पूर्वक मोमबत्ती और मोबाइल थामे खड़े रहे , बड़े हीं धूमधाम और हर्षौल्लास के संग मनाया ! असीम गौरव के इस राष्ट्रीय गर्व के पर्व को हर साल मनाया जाएगा ऐसी उम्मीद करता हूँ ! २६/११ की गौरवपूर्ण घटना के दौरान प्रशांत प्रियदर्शी द्वारा लिखे गये एक पोस्ट को आप दुबारा पढ़िए जो नीचे पुनः पोस्ट कर रहा हूँ ………….

अथ चूतिया नंद कथा

ये कथा है एक ऐसे महानुभाव कि जिन्होंने एक ऐसे शहीद और कर्तव्यनिष्ठ जवान पर अंगुली उठाई है जिसका कर्जदार यह समूचा देश सदियों तक रहेगा.. मैं हमारे पूर्वजों को धन्यवाद देना चाहूंगा जिन्होंने चूतिया कह कर किसी प्राणी को पुकारा नहीं, नहीं तो यह उस जीव के अधिकारों का हनन होता.. कुत्ते अपने आप में वफादार होते हैं और सूअर भी गंदगी साफ करने में सहायता ही करते हैं.. इन्हें यह नाम देकर मैं इन जानवरों को गालियां नहीं देना चाहता हूं..

वैसे इस श्रेणी में कुछ पत्रकार नाम के ह्रिंस पशु भी हैं जो अभी भी लाल सलाम को सलामी देकर इसे प्रमुखता ना देकर इधर-उधर कि ज्यादा खबरें देकर अपना टीआरपी बटोरना चाह रहे हैं.. कारण साफ है, आखिर संत चुतिया नंद भी लाल सलामी देने वालों के अगुवा जो ठहरे.. ये तथाकथित बुद्धीजीवियों का बस चले तो लगे हाथों पूरे भारत को चीन के हवाले करके सलामी पे सलामी देते रहें..

जहां तक स्वर्गीय मेजर संदीप उन्नीकृष्णन की बात है तो वो जब जीते थे तब भी भारत कि एकता के मिशाल थे और शहीद होने के बाद उनकी कहानी बच्चे-बच्चे तक पहूंच गई.. कारण साफ है.. वो रहने वाले थे केरल के.. पदस्थापित थे बिहार के दानापुर में बिहार रेजिमेंट में.. आतंकियों से मुकाबला करने को उड़ान भरी दिल्ली से.. शहीद हुये मुंबई में.. और अंत्येष्टी हुआ कर्नाटक में.. अब इससे बड़ी और क्या मिशाल दिया जाये उनकी और भारतीय एकता की?

मैं सलाम करता हूं उस मुसलिम भाई को भी जो परदे के पीछे रह कर नरीमन हाऊस मामले में हमारे जांबाज कमांडो कि मदद अपने जान पर खेल कर दी.. जिसने पूरे नरीमन हाऊस का नक्सा बना कर हमारे कमांडो को दिया और पूरे 59 घंटे तक कमांडो कार्यवाही में कमांडो के साथ रहा.. कुछ इस तरह गुमनामी में रहकर उन्होंने यह काम किया कि मुझे उनका नाम भी याद नहीं आ रहा है.. भला हो अगर कोई मुझे उनका नाम याद दिला दे, आगे से नहीं भूलूंगा.. मैं सलाम करता हूं उन मुल्लाओं को भी जिन्होंने मारे गये आतंकवादियों को भारत में दफनाने के लिये जगह ना देने कि घोषणा भी कि..

इधर एक और लाशों के खिलाड़ी चुनाव सामने देखकर केरल कि गलती के लिये माफी मांग रहे हैं, पता जो है उन्हें कि चुनाव सामने ही है.. जिस जगह से माफीनामा आया है आखिर आज वहां चुनाव प्रचार का आखिरी दिन जो है..

अंत में – मेरा अपना यह मानना है कि जहां तर्क कि सीमा खत्म होती है वहां से गालियों कि सीमा शुरू होती है॥ और मैं यह स्वीकार करता हूं कि मेरी नजर में ऐसे खूंखार नमक हरामों और आतंकवादियों को बिना किसी तर्क और सबूतों के गोली से उड़ा देना चाहिये.. मगर यह भी जानता हूं कि ऐसा नहीं होने वाला है.. फिलहाल तो मेरी तर्क कि सीमा खत्म होती है और मुझे अपने द्वारा किये गये इस तरह कि गंदी भाषा प्रयोग पर कोई दुख नहीं है..

साभार : मेरी छोटी सी दुनिया

>हिंदी सबके मन बसी –संजीव’सलिल’

>हिंदी सबके मन बसी

आचार्य संजीव’सलिल’, संपादक दिव्य नर्मदा

हिंदी भारत भूमि के, जन-गण को वरदान.
हिंदी से ही हिंद का, संभव है उत्थान..

संस्कृत की पौत्री प्रखर, प्राकृत-पुत्री शिष्ट.
उर्दू की प्रेमिल बहिन, हिंदी परम विशिष्ट..

हिंदी आटा माढिए, उर्दू मोयन डाल.
‘सलिल’ संस्कृत तेल ले, पूड़ी बने कमाल..

ईंट बने सब बोलियाँ, गारा भाषा नम्य.
भवन भव्य है हिंद का, हिंदी ह्रदय प्रणम्य.

संस्कृत पाली प्राकृत, हिंदी उर्दू संग.
हर भाषा-बोली लगे, भव्य लिए निज रंग..

सब भाषाएँ-बोलियाँ, सरस्वती के रूप.
स्नेह पले, साहित्य हो, सार्थक सरस अनूप..

भाषा-बोली श्रेष्ठ हर, त्याज्य न कोई हेय.
सबसे सबका स्नेह ही, हो लेखन का ध्येय..

उपवन में कलरव करें, पंछी नित्य अनेक.
भाषाएँ अगणित रखें, मन में नेह-विवेक..

भाषा बोले कोई भी. किन्तु बोलिए शुद्ध.
दिल से दिल तक जा सके, बनकर दूत प्रबुद्ध..

खदानों में हाथ डालिये, मधु कोड़ा और रेड्डियों जैसे खरबपति बनिये… Mining Mafia, Jharkhand, Madhu Koda, Congress

जब झारखण्ड में काले चश्मे वाले राज्यपाल सिब्ते रजी के जरिये काला खेल करवाकर “धर्मनिरपेक्षता” के नाम पर तथा “भाजपा को अछूत बनाकर” सत्ता से दूर रखने का खेल खेला गया था, उसमें “भ्रष्टाचार की माँ” कांग्रेस-राजद और बाकी के लगुए-भगुए किसी धर्मनिरपेक्ष सिद्धान्त के नाम पर एकत्रित नहीं हुए थे… निर्दलीय विधायक को मुख्यमंत्री बनाने पर राजी वे इसलिये नहीं हुए थे कि भाजपा के खिलाफ़ उन्हें लड़ाई लड़ना थी… बल्कि सारे के सारे ठग भारत माँ के सीने में छेद करके खदानों के जरिये होने वाली अरबों-खरबों की कमाई में हिस्सा बटोरने के लिये “गैंग” बनाये हुए थे। जैसे-जैसे मधु कोड़ा की लूट के किस्से उजागर हो रहे हैं, देश का मेहनतकश और निम्न-मध्यमवर्गीय व्यक्ति कुछ अचम्भे से, कुछ निराशा-हताशा से, कुछ गुस्से से और कुछ मजबूरी से इन लुटेरों को मन मसोसकर देख रहा है।

एक समय में मामूली से कंस्ट्रक्शन वर्कर और खदानकर्मी से मुख्यमंत्री बनने और भारतभूमि की अरबों की सम्पत्ति हड़प करने वाले की हरकतों के बारे में लालू और कांग्रेस को पता ही नहीं चला होगा, ऐसा कोई मूर्ख ही सोच सकता है। जबकि जो लोग कोड़ा और कांग्रेस को जानते हैं उन्हें पता था कि ऐसा कोई महाघोटाला कभी न कभी सामने आयेगा।

झारखण्ड से कोयले का अवैध खनन सालाना करीब 8000 करोड़ रुपयों का है, जिसमें लगभग 500 माफ़िया गुट अलग-अलग स्तरों पर जुड़े हुए हैं। कोयला खदानों के अधिकारी और स्थानीय गुण्डे इस रैकेट का एक मामूली पुर्जा मात्र हैं। मनचाहे इलाके में ट्रांसफ़र करवाने के लिये अधिकारियों द्वारा छुटभैये नेताओं से लेकर मुख्यमंत्री तक करोड़ों रुपये की रिश्वत अथवा “अरबों रुपये कमाकर देने की शपथ” का प्रावधान है। इस माफ़िया गैंग की कार्यप्रणाली एकदम सीधी और स्पष्ट है, ऐसी खदानों की पहचान की जाती है जो “बन्द” या समाप्त घोषित की जा चुकी हैं (अथवा मिलीभगत से “बन्द” घोषित करवा दी गई हैं), फ़िर उन्हीं खदानों में से फ़िर से लोहा और अयस्क निकालकर बेच दिया जाता है, और ऐसा दिनदहाड़े किया जाता है, क्योंकि ऊपर से नीचे तक सबका हिस्सा बाँटा जा चुका होता है। बताया जाता है कि सारे खेल में “सेल” (स्टील अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया लिमिटेड) के उच्चाधिकारी, खान मंत्रालय और झारखण्ड सरकार मिले हुए होते हैं। खदानों से निकली हुई लाल मिट्टी और अयस्क को कच्चे लोहे में परिवर्तित करने वाले हजारों “क्रशर्स” झारखण्ड में यत्र-तत्र देखे जा सकते हैं जिनमें से 95% के मालिक नेता ही हैं, जो फ़र्जी नामों से छोटे-मोटे खदान ठेकेदार आदि बने हुए हैं। इस प्रकार की छोटी-छोटी फ़ैक्टरियाँ ही करोड़ों कमा लेती हैं, जिसे अंग्रेजी में “टिप ऑफ़ आईसबर्ग” कहा जाता है (हिन्दी में इसे “भ्रष्टाचार के महासागर की ऊपरी लहरें” कहा जा सकता है)

http://ibnlive.in.com/news/exclusive-how-exjharkhand-cm-madhu-koda-profited-from-mines/105088-3.html?utm_source=IBNdaily_MCDB_121109&utm_medium=mailer

वैसे तो यह लूट सालों से जारी है, जब कांग्रेस सत्ता में थी तब भी, और जब 15 साल लालू सत्ता में थे तब भी। झारखण्ड के बिहार से अलग होने का सबसे अधिक दुख लालू को यों ही नहीं हुआ था, असल में एक मोटी मुर्गी हाथ से निकल जाने का वह दुख था, ठीक उस प्रकार जैसे मध्यप्रदेश के नेताओं को छत्तीसगढ़ के निकल जाने का दुख हुआ, क्योंकि छत्तीसगढ़ “लूटने” के काम भी आता था और ईमानदार और सख्त अफ़सरों को सजा के बतौर बस्तर/अम्बिकापुर ट्रांसफ़र करने के काम भी आता था। कहने का मतलब ये कि मधु कोड़ा तो हमारी नज़रों में सिर्फ़ इसलिये आये कि उन्होंने कम से कम समय में अधिक से अधिक कमाने का मौका नहीं गंवाया।

आंध्रप्रदेश के “राष्ट्रसन्त” वायएस राजशेखर रेड्डी, अनधिकृत रूप से देश के सबसे अधिक पैसे वाले नेता माने जाते हैं (शरद पवार के समकक्ष)। उन्हीं के नक्शेकदम पर चल रहे हैं उनके बिजनेस पार्टनर कर्नाटक के खनन माफ़िया रेड्डी बन्धु। एक छोटा सा उदाहरण देता हूं… मध्यप्रदेश में एक सड़क ठेकेदार पर खनन विभाग ने 32 लाख रुपये की वसूली का जुर्माना निकाला, ठेकेदार ने सड़क निर्माण करते-करते सड़क के दोनों ओर नाली खुदाई करके उसमें से निकलने वाली मुरम चुपके से अंटी कर ली, जबकि कुछ का उपयोग वहीं सड़क बनाने में कर दिया… अब सोचा जा सकता है कि सिर्फ़ 8 किलोमीटर की सड़क के ठेके में सड़क के दोनों तरफ़ खुदाई करके ही ठेकेदार लाखों की मुरम निकालकर सरकार को चूना लगा सकता है, तो सुदूर जंगलों में धरती से 100-200 फ़ुट नीचे क्या-क्या और कितना खोदा जा रहा होगा और बाले-बाले ही बेचा जा रहा होगा (ठेकेदार पर 32 लाख का जुर्माना भी “ऑफ़िशियल” तौर पर हुआ, हकीकत में उस ठेकेदार ने पता नहीं कितना माल ज़मीन से खोदा होगा, ऊपर कितना पहुँचाया होगा और जुर्माना होने के बाद सरकारी अफ़सरों के घर कितना पहुँचाया होगा, इसका हिसाब आप कभी नहीं लगा सकते)।

असल में आप कल्पना भी नहीं कर सकते कि खनन के काम में कितनी अनाप-शनाप कमाई है। मधु कोड़ा का भ्रष्टाचार का आँकड़ा, इन तीनों रेड्डियों (एक दिवंगत और दो बाकी) तथा उनके बेटे जगनमोहन के मुकाबले कुछ भी नहीं है। एक मोटे अनुमान के अनुसार चारों रेड्डियों ने इस देश के राजस्व को लगभग 75,000 करोड़ रुपये से अधिक का चूना लगाया है। पिछले दिनों कर्नाटक में जो खेल खेला गया उसके पीछे भी आंध्रप्रदेश के रेड्डी का ही हाथ है, जिसने येद्दियुरप्पा को भी रुलाकर रख दिया। उनका असली खेल यह था कि किसी तरह येदियुरप्पा न मानें और भाजपा में टूट हो जाये फ़िर कांग्रेस के अन्दरूनी-बाहरी समर्थन से सरकार बना ली जाये, ताकि आंध्र-कर्नाटक की सीमा पर स्थित बेल्लारी की खदानों पर सारे रेड्डियों का एकछत्र साम्राज्य स्थापित हो जाये। बेशर्म लालच की इन्तेहा देखिये कि रेड्डियों ने आंध्र-कर्नाटक की सीमा पर स्थित जंगलों में भी बेतहाशा अवैध खनन किया है और अब सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें फ़टकार लगाई है। आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री रोसैया को इसका फ़ायदा हुआ है और अब वह सीबीआई और जाँच की धमकी की तलवार के बल पर जगनमोहन रेड्डी को दबोचे हुए हैं।

अब आते हैं नक्सलियों पर, नक्सली विचारधारा और उसके समर्थक हमेशा से यह आरोप लगाते आये हैं कि आदिवासी इलाकों से लौह अयस्क और खनिज पदार्थों की लूट चल रही है, सरकारों द्वारा इन अति-पिछड़े इलाकों का शोषण किया जाता है और खदानों से निकलने वाले बहुमूल्य खनिजों का पूरा मुआवज़ा इन इलाकों को नहीं मिलता आदि-आदि। लेकिन तथाकथित विचारधारा के नाम पर लड़ने वाले इसे रोकने के लिये कुछ नहीं करते, क्योंकि खुद नक्सली भी इन्हीं ठेकेदारों और कम्पनियों से पैसा वसूलते हैं। यहीं आकर इनकी पोल खुल जाती है, क्योंकि कभी यह सुनने में नहीं आता कि नक्सलियों ने किसी भ्रष्ट ठेकेदार अथवा खदान अफ़सर की हत्याएं की हों, अथवा कम्पनियों के दफ़्तरों में आग लगाई हो…। मतलब ये कि खदानों और खनिज पदार्थों की लूट को रोकने का उनका कोई इरादा नहीं है, वे तो चाहते हैं कि उसमें से एक हिस्सा उन्हें मिलता रहे, ताकि उनके हथियार खरीदी और ऐश जारी रहे और यह सब हो रहा है आदिवासियों के भले के नाम पर। नक्सली खुद चाहते हैं कि इन इलाकों से खनन तो होता रहे, लेकिन उनकी मर्जी से… है ना दोगलापन!!! यदि नक्सलियों को वाकई जंगलों, खनिजों और पर्यावरण से प्रेम होता तो उनकी हत्या वाली “हिट लिस्ट” में मधु कोड़ा और राजशेखर रेड्डी तथा बड़ी कम्पनियों के अधिकारी और ठेकेदार होते, न कि पुलिस वाले और गरीब निरपराध आदिवासी।
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विषयान्तर :- ऐसे भ्रष्ट संस्कारों और संस्कृति की जन्मदात्री है कांग्रेस…। इसके जवाब में यह तर्क देना कि भाजपा-बसपा-सपा-शिवसेना-कमीनिस्ट सभी तो भ्रष्ट हैं, नितान्त बोदा और बेकार है, क्योंकि ये भी उसी संस्कृति की पैदाइश हैं। असली सवाल उठता है कि ऐसी “खाओ और खाने दो” की संस्कृति का विकास किसने किया और इसे रोकने के प्रयास सबसे पहले किसे करना चाहिये थे और नहीं किया…। फ़िर भी लोग मुझसे पूछते हैं कि मैं कांग्रेस से घृणा क्यों करता हूं? (इस विषय पर जल्दी ही एक पोस्ट आयेगी…)

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>एक गीत : जीवन के सुबह के लिखी …..

>एक गीत: जीवन के सुबह की….

जीवन के सुबह की लिखी हुई पाती‘
मिलती है शाम ढले मुझको गुमनाम

पूछा है तुमने जो मइया का हाल
कमजोरी खाँसी से अब भी बेहाल
लगता है आँखों में है मोतियाबिन
बोलो तुम्हारी है कैसी ससुराल?

चार-धाम करने की हठ किए बैठी
खटिया पर पड़े-पड़े लेती हरिनाम

मईया से कहना कि ’मुनिया’ भली है
दूधो नहाई और ,पूतो फली है
सासू बनाने की चाहत अधूरी –
विधिना विधान की बस बातें खली है

अगले जनम की क्या बातें अभी से
मइया से कह देना हमरा परनाम

अब की जो सावन में जाना हो गाँव
बचपन की यादें औ’ कागज की नाव
मिल कर जो बाँधे थे मन्नत के धागे‘
धूप सी चुभेगी उस बरगद की छाँव

सावन के झूलों की यादें सताती –
अब भी क्या लिख-लिख मिटाती हो नाम?

सुनते हैं , लाए हो गोरी अंग्रेजन
इंगलिश में गुटुर-गूँ ,चलती है बन-ठन
बन्दर के गले पड़ी मोती की माला
ऊँट ने गले पहनी बिल्ली की लटकन

धत पगली !क्यों छेड़े मुझको फ़िर आज?
अच्छा हुआ तुमने जो लिखा नहीं नाम

छोड़ो सब बातें ,सुनाओ कुछ अपनी
कैसे हैं “वो” और बहुएँ हैं कितनी‘ ?
नाती औ’ पोतों को दादी के किस्से
सुनाना, बताना न बातें कुछ अपनी

पोतों संग गुज़रेगी बाकी उमरिया
बहुएँ है खाने लगी फ़िर कच्चे आम

-आनन्द पाठक.जयपुर
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